महाराज की जय हो : आशीष रंजन चौधरी
सभ्यताओं के विकास के उपक्रम को अगर देखें तो रोटी, कपड़ा और मकान के बाद मनुष्य की अगली सबसे बड़ी जरूरत अपनी मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति ही रही है। शुरुआती दौर में अभिव्यक्ति का आधार बेहद सरल था, लोगों का एकमात्र उद्देश्य अपने मन के विचारों को सामने वाले व्यक्ति तक पहुंचाना ही होता था।परंतु…
बिहार : गौरव से हास्यप्राय तक – हमारी ज़िम्मेदारी क्या है?
बिहार भारत का वह राज्य है, जिसने चाणक्य की राजनीति, महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करुणा, अशोक का विस्तार और नालंदा की विद्या परंपरा को जन्म दिया। जिस बिहार की धरती पर दशरथ मांझी जैसा दृढ़ संकल्प और परिश्रमी व्यक्ति का जन्म हुआ । जिस धरती ने गांधी को महात्मा और जयप्रकाश नारायण को लोकनायक…
शिक्षा दुर्दशा में अभी भी कुछ बाकी है क्या!
कभी दिल्ली यूनिवर्सिटी, बॉम्बे यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) जैसी संस्थाएं केवल डिग्री नहीं देती थीं वे विचार देती थीं, दिशा देती थीं और देश को जगाने का कार्य करती थीं। उन विश्वविद्यालयों के क्लासरूम केवल ज्ञान अर्जन के केंद्र नहीं थे, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के अड्डे हुआ करते थे।…
नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने की संकल्पना
भाषा न केवल संचार का एक माध्यम है अपितु यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से भी बेहद महत्त्वपूर्ण है। भाषा विचारों, मान्यताओं और रीति-रिवाजों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का भी कार्य करती है।भाषा साहित्य, संगीत एवं अन्य कलात्मक विधाओं की अभिव्यक्ति का भी मूल आधार है। किसी भी सभ्यता एवं संस्कृति…
ठंडा गोश्त- सआदत हसन मंटो
ईशर सिंह ज्यों ही होटल के कमरे में दाख़िल हुआ, कुलवंत कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज़ तेज़ आँखों से उसकी तरफ़ घूर के देखा और दरवाज़े की चटख़्नी बंद कर दी। रात के बारह बज चुके थे, शहर का मुज़ाफ़ात एक अजीब पुर-असरार ख़ामोशी में ग़र्क़ था। कुलवंत कौर पलंग पर आलती पालती…
