हरप्पा के लोग मांश खाते थें, हरियाण मे मिली भुने हुए मांश की हड्डियां

भारत मे मांस खाने का प्रचलन पुराना है, इसे सिद्ध करने के लिए हमरे धार्मिक पुस्तकों मे पूर्ण साक्ष्य मौजूद हैं| उन सब मे जो पुस्तक सबसे ऊपर आती है, वह है ऐतरेय ब्राह्मण, जिसके द्वितीय पंचिका के अध्याय प्रथम और द्वितीय मे पशुवों के बलि देने का संपूर्ण विवरण मौजूद है | ऋग्वेद के दसम मंडल मे भी कुछ ऐसे मंत्र हैं जो पशु बलि को बढ़ावा देने की बात करते हैं | अथर्वा वेद मे भी कुछ मंत्र पशुवो के मंशा का प्रयोग औषधि के रूप प्रयोग करने की बात कहते हैं |

हिन्दू धर्म के कुछ निष्ठावान विश्वाशी उन मन्त्रों को साक्ष्य के रूप प्रयोग करने पर यह कह कर विरोध कर सकते हैं की इन वेदो का अनुवाद उन ईसाईयों और यूरोपी लोगों ने किया है जो पशुवो का सेवन करते हैं और जिनके धर्म मे मांश भक्षण का कोई विरोध नहीं है और ऐसे लोग उन मन्त्रों का तात्पर्य या अर्थ अपने समाज और सोच को आधारित कर निकला है |

लेकिन हाल ही मे हरियाणा सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा एक ऐसी खोज हुयी है, जो उन लोगों का  जो यह मानते हैं की भारत के लोग कभी मांस नहीं खाते थें का मुंह बंद कर देगा | दरअसल हरियाणा का पुरातत्व विभाग काफी समय से हरियाणा के कुनाल नमक स्थान पर खुदाई कर रहा था | कुनाल, हरियाणा का सबसे पुराने हरप्पन साइटो मे से एक है , यहाँ खुदाई करते समय शोधकर्ताओं को पके हुए मांश की हड्डियां प्राप्त हुयी हैं | खोजकर्ताओं के अनुसार निश्चय ही इस जगह पर रहने वाले लोग मांशाहारी रहे होंगे और प्राप्त हुए हड्डी के टुकड़े उनके आहार का अवशेष है |

हालाकिं अन्वेषकों ने अभी इन हड्डियों का पूर्ण रूप से जेनेटिक अध्यन नहीं किया है , लेकिन उनके अनुशार ये हड्डियां नीलगाय,भैंस या किसी और जानवर का हो सकता है | अध्ययन के लिए उन्होंने इन हड्डियों का अवशेष लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट आफ पलाइओस्केन्सेस को भेज दिया है |यह ज्ञात नही हो सका है  की ऐसे पशु वे खाने के लिए पालते थें या फिर शिकार कर के लाते थें | लेकिन इस तरह के साक्ष्य निश्चय ही झुठलाए नहीं जा सकते हैं और इसका कोई विरोध नहीं कर सकता की हमारे पूर्वज मांशाहारी थें |

 

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