भारत के पूर्व उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण अडवानी का जीवन

भारत के पूर्व उप-प्रधानमंत्री तथा भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष लाल कृष्ण अडवानी का जन्म 8 नवम्बर 1927 में पाकिस्तान के करांची में एक हिन्दू सिंधी परिवार में हुआ था | उनके पिता किशनचंद अडवानी करांची के एक छोटे व्यापारी थें, उनकी माता का नाम ज्ञानी देवी था | अडवानी ने अपनी प्रारम्भि शिक्षा करांची के ही सेंट पैट्रिक्स हाई स्कूल से पूरी की | भारत और पाकिस्तान के बटवारे के बाद उनका परिवार मुंबई आकर बस गया, यहीं पे बॉम्बे यूनिवर्सिटी के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से उन्होंने कानून की पढ़ायी पूरी की | अडवानी ने अपने राजनितिक जीवन की शुरुआत 1942 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सचिव के रूप में शुरू की | आज़ादी के बाद भारत आकर वे भरतीय जन संघ नाम की राजनीतिक पार्टी के सदस्य बन गयें | फिर वे राजस्थान राज्य में जन संघ के संयुक्त सचिव के पद पर चुने गयें | 1958 में वे दिल्ली में जन संघ के सचिव बनाएं गयें, तब से वे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी के साथ मिलकर एक छोटी सी पार्टी भारतीय जन संघ को भारतीय राजनीती के शिखर तक पहुँचाने में अहम् योगदान दिया | 1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा लगाये गये आपातकाल का उन्होंने विरोध किया, जिसके लिये उन्हें 18 महीने जेल में भी बिताना पड़ा | फिर जब 1977 -79 में जब जनता पार्टी ने अपना सरकार बनाया तो लाल कृष्ण अडवानी सूचना और प्रसारण मंत्री बनाये गयें | जनता पार्टी के विखंडन के बाद जब अटल विहारी बजेयी और लाल कृष्ण अडवानी ने भारतीय जनता पार्टी बनायी तब अडवानी इसके महासचिव बनाये गयें | भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने रथा यात्रा के ज़रिये भारतीय राजनीती में हिंदुत्व और राष्ट्रवादी विचारों को एक नयी हवा दी | कांग्रेस पार्टी में राजीव गाँधी के मृत्यु से पैदा हुए नेत्रित्वात्मक शून्यता और देश में हो रहें दंगो तथा नए धार्मिक कट्टरता ने उनकी विचारधारा को नए समर्थक प्रदान किए, जिनके दम पर 1984 में सिर्फ २ सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी 1999 में 181 सीटों के साथ देश की सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी | भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 1998 ने अपनी सरकार बनायी, जिसमे लाल कृष्ण अडवानी को गृहमंत्री का पदभार दिया गया | फिर 2002 में उन्हें भारत का सातवां उप-प्रधानमंत्री बनाया गया | २००४ के चुनवों में मिली हार के बाद,अटल विहारी बाजपेयी ने राजनीती से सन्यास ले लिया, जिसके बाद वे संसद में विपक्ष के अध्यक्ष पद पर असिन हुयें |

अडवानी भारतीय राजनीती में अपने विवादास्पद वयानों के लिए अवश्य जाने जायेंगें लेकिन इस बात को भी कोई नकार नहीं सकता की वे भारत के एक योग्य वक़्ता और राजनेता थें, जिन्होंने भारत के विकाश और निर्माण में एक अहम् योगदान दिया है |

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