भारत की वे महान खोजें जिनका इतिहास मे कोई स्थान नही

प्राचीन भारत के महान ऋषि अपने जीवन का सम्पूर्ण काल जंगलों मे सत्य को जानने और खोजने मे व्यतीत कर देते थें| वे ऋषि एकांत मे घने वनों के मध्य स्थित अपने कुटियों मे कुछ शिष्यों के साथ प्रकृति और ब्रम्हांड के उन रहस्यों को समझने की कोशिश करते रहते थें जो उस काल के मानव मेधा के समझ से परे था | भारत के कई उपनिषद और ग्रन्थ उन ऋषिओं द्वारा उन्ही जंगलों मे लिखा गया है| वे महान ज्ञानी नव चेतन के मानष मे उठे जिज्ञासाओं को समझने और उनके प्रश्नो को आध्यत्मिक और वैज्ञानिक पद्धति से समझने की कोसिस करते रहें | इन वनो मे इन शिक्षकों के द्वारा अपने शिष्यों को दिए गये ज्ञान ही वेदों के आरण्या साहित्य का मूल हैं |

आधुनिक काल मे किये गयें बहुत से खोज वास्तव मे हजारों साल पहले इन महा ज्ञानियों के द्वारा पहले ही खोजा जा चूका था | इतिहास मे इनके द्वारा किये गये खोजों को बुला दिया गया हैं, वर्तमान समय मे किये गयें खोज को ही मूल मान कर इनके प्राचीन कल्पनाओं, योगदान और ज्ञान को भुला दिया गया है |

जैसे की आज भी विज्ञान के हमारे पुस्तकों मे यही वर्णित हैं की गुरुत्वाकर्षण की खोज न्यूटन ने की है, लेकिन वास्तव मे गुरुत्व बल की सर्व प्रथम अवधारणा भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री भास्कराचार्य- II ने अपने पुस्तकों मे न्यूटन से लगभग 500 साल पहले ही दे दिया था| भास्कराचार्य द्वारा रचित ‘लीलावती’ और ‘बीजगणिता’ को आज भी विज्ञान और गणित की अनमोल रचना मानी जाती हैं | भास्कराचार्य ने लिखा है की सभी वस्तुयें पृथ्वी पर, पृथ्वी द्वारा लगाए गये एक खास तरह के आकर्षण बल के कारण ही गिरती हैं और यह वही बल है जिसके कारण पृथ्वी,सूर्य, चंद्र और सभी ग्रह अपनी कक्षा मे स्थापित रहते हैं | इस महान खोज को हमारे विज्ञान के पुस्तक मे कोई जगह नही दी गयी है, अगर पढ़ाया जाता तो यह शायद हमारे लिए एक बड़े गर्व की बात होती |

ऐसे ही मन जाता हैं की जॉन डाल्टन ने ही परमाणु की खोज की है लेकिन आज से लगभग 2500 साल पहले कणाद नाम के एक दार्शनिक ने संस्कृत मे लिखे अपने पुस्तक ‘वैशेषिका सूत्र’ मे परमाणु के बारे मे लिखा है की सभी पदार्थ बहुत ही छोटे-छोटे कणों से बने हैं जिन्हे उन्होंने ने परमाणु नाम दिया, साथ ही उन्होंने यह भी बताया की यह परमाणु ही कई तरह से जुड़ के पदार्थ की रचना करते हैं |

इन दोनों खोजों को हमारे विज्ञान के पुस्तकों मे उतना ज्यादा महत्व नही दिया गया हैं, जबकि आश्चर्य की बात यह है की उस युग मे जब मानव को अपने अस्तित्व की पूर्ण समझ नही थी, इन ज्ञानियों ने वह खोजा जो शायद उस काल के मनुष्यों के समझ से परे था |

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